क्या आपने कभी सोचा है कि धरती पर सबसे पहला जीवन कैसे आया? यह सवाल सिर्फ विज्ञान का ही नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी बहुत अहम है। इस्लाम और विज्ञान, दोनों की नजर से इस विषय को समझने की कोशिश करते हैं।
इस्लाम में जीवन की शुरुआत को लेकर दो मान्यताएँ
आज के दौर में इस्लाम में जीवन की उत्पत्ति को लेकर दो अलग-अलग मान्यताएँ प्रचलित हैं। पहली, जो कुरान में दी गई है, और दूसरी, जो बाइबिल से आई मान्यता पर आधारित है।
बाइबिल के अनुसार, आदम को मिट्टी से बनाया गया और स्त्री को उसकी पसली से। लेकिन कुरान हमें बार-बार यह कहता है कि धरती पर घूमो, समझो और खुद पता लगाओ कि जीवन की शुरुआत कैसे हुई।
कुरान में जीवन की शुरुआत का जिक्र
कुरान हमें बार-बार यह प्रेरणा देता है कि हमें धरती पर जीवन की उत्पत्ति को समझने के लिए खुद शोध करना चाहिए। यह केवल विज्ञान का विषय नहीं है, बल्कि हमारे लिए एक संकेत भी है कि आने वाली ज़िंदगी यानी परलोक को भी हम बेहतर समझ सकें।
अगर संक्षेप में कहें, तो कुरान हमें “विकास” यानी Evolution की ओर इशारा करता है। यह बताता है कि जीवन अचानक नहीं आया, बल्कि एक क्रमबद्ध तरीके से विकसित हुआ।
जीवन की शुरुआत में कौन-से तत्व शामिल थे?
कुरान के अनुसार, जीवन एक खास तरह की मिट्टी से बना, जो समुद्र में पाई जाती है। विज्ञान भी यही कहता है कि समुद्र में मौजूद खनिज और अन्य तत्वों से ही जीवन की शुरुआत हुई। लेकिन जीवन को शुरू करने के लिए सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि ऊर्जा की भी जरूरत होती है।
विज्ञान इसे इस तरह समझाता है:
- अगर ऊर्जा जल-आधारित यौगिक में संग्रहीत होती है, तो इसे “कोशिका” (Cell) कहा जाता है। यह जीवविज्ञान (Biology) का हिस्सा है।
- अगर ऊर्जा किसी ठोस तत्व में संग्रहित होती है, तो उसे “परमाणु” (Atom) कहते हैं, जो रसायन विज्ञान (Chemistry) से जुड़ा होता है।
ऊर्जा का स्रोत क्या था?
कुरान में “नार इन समूम” (Naar in Samoom) शब्द आता है, जिसका अर्थ है “गर्मी” या “ऊष्मा”। यह वही ऊर्जा थी, जिससे जीवन की शुरुआत हुई। कई अनुवादकों ने “जान” (Jaan) को “जिन्न” (Jinn) का रूप दे दिया, लेकिन असल में यह जीवन की उत्पत्ति को दर्शाने वाला शब्द है।
समुद्र की गहराइयों में जीवन की उत्पत्ति
आज विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि जीवन की शुरुआत समुद्र की गहराइयों में हुई थी, जिसे “हाइड्रोथर्मल वेंट्स” (Hydrothermal Vents) कहा जाता है। यह समुद्र के तल पर मौजूद वे स्थान हैं, जहाँ पृथ्वी के अंदर से गर्मी और खनिज बाहर निकलते हैं।
- जब गर्मी और पानी आपस में मिले, तो कुछ रासायनिक क्रियाएँ हुईं, जिससे जीवन के लिए जरूरी झिल्लीदार संरचना बनी।
- धीरे-धीरे यह कोशिकाएँ विकसित हुईं और जीवन का आरंभ हुआ।
- कुछ समय बाद, ये कोशिकाएँ सूर्य की रोशनी के संपर्क में आईं और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करने लगीं।
- यही से जीवन समुद्र से धरती तक फैल गया।
इंसान का विकास और आदम का जिक्र
जब यह कोशिकाएँ विकसित होते-होते मानव रूप में आईं, तब कुरान ने इस अवस्था को “आदम” कहा। यह विज्ञान में Homo sapiens यानी आधुनिक मानव कहलाते हैं।
लेकिन कुरान कहता है कि जब इंसान का शरीर पूरी तरह विकसित हो गया, तब ईश्वर ने उसमें रूह (आत्मा) फूंकी। इससे इंसान में दो खास चीजें आईं:
- बुद्धि (Intelligence) – जिससे उसने सोचना और समझना सीखा।
- स्वतंत्रता (Freedom) – जिससे वह अच्छा और बुरा चुन सकता है।
जान और आत्मा का कार्य
कुरान हमें यह भी बताता है कि हर इंसान के अंदर दो तरह की प्रवृत्तियाँ होती हैं:
- जान (Jaan) – यह हमारे शरीर से जुड़ा होता है। हमें भूख लगती है, डर लगता है, और संतान उत्पत्ति की इच्छा होती है। इसका सिद्धांत “लेना” (Taking) है।
- आत्मा (Spirit) – यह हमें अच्छे कर्म करने और दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें “देने” (Giving) की भावना सिखाता है।
अगर कोई इंसान सिर्फ जान के हिसाब से चलता है, तो वह लालच और स्वार्थ में फँस जाता है। यही चीज़ इंसान के अंदर “इबलीस” (Iblees) यानी बुरी सोच को जन्म देती है।
दूसरी ज़िंदगी का संकेत
कुरान यह भी बताता है कि जैसे पहला जीवन ऊर्जा और पदार्थ से बना, वैसे ही दूसरी ज़िंदगी यानी परलोक भी ऊर्जा से बनेगी।
- अगर कोई इंसान सिर्फ अपनी इच्छाओं में उलझा रहा, तो उसकी ऊर्जा गर्मी में बदल जाएगी।
- अगर वह परोपकार करता है, तो उसकी ऊर्जा प्रकाश में बदल जाएगी, जो उसे जन्नत में ले जाएगी।
निष्कर्ष
कुरान और विज्ञान, दोनों इस बात से सहमत हैं कि जीवन धीरे-धीरे विकसित हुआ।
- जीवन की शुरुआत समुद्र में हुई।
- इंसान का विकास एक क्रमबद्ध प्रक्रिया में हुआ।
- इंसान के अंदर एक आत्मा डाली गई, जिससे उसे सोचने और सही-गलत का चुनाव करने की शक्ति मिली।
- दूसरी ज़िंदगी की नींव इस जीवन में किए गए अच्छे कर्मों पर निर्भर करती है।
इसलिए, कुरान सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन की उत्पत्ति और उसके उद्देश्य को समझने के लिए भी प्रेरित करता है। यह विज्ञान और आध्यात्म का एक बेहतरीन संगम है, जिसे समझकर हम अपने जीवन को और बेहतर बना सकते हैं।
शुक्रिया संदेश:
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